ख्वाब से हकीकत तक
सोते जगते देखे थे ,जो ख्वाब ।
हंस-हंसकर सोचे थे, जो ख्वाब ।।
सोच थी मेरी पूरा करूंगा,
सोच सोच कर सोचे थे जो ख्वाब।।
ख्वाब था मेरा हकीकत करने को ।
मेहनत करूंगा हर ख्वाब पाने को।।
सब कुछ था बेहतर मिला मुझे,,
एक उम्र थी, मिली मुझे , सच करने को ।।
एक वक्त था, मिला मुझे, मुकम्मल करने को।।
एक राह थी, मिली मुझे , पाने को।।
सब गवारा रहा,,,, ,,,,,, ,,,,,,,
ना उम्र,ना वक्त,ना राहे मुकम्मल हुई ।।
ख्वाब थे,ख्वाब रहे,हकीकत न कोई ख्वाब हुए।।
किसी को नाम दिया मजबूरी का ,
कुछ मेहनत के मारे रहे ,,
हालात ए जिंदगी ऐसे बने ,ख्वाब अधूरे थे और अधूरे रहे ।।
कुछ थे जो मेरे पास ,अपने थे ,।।
ख्वाबों की राहों में, वो भी ख्वाब बन गए।।
एक आशियां था मेरा , जिसमें मैंने ख्वाब बुने थे ,
वह आशियां भी आज ख्वाब बन गया।।
पाने की राह में सब खो दिए,,
मंजर ए जिंदगी ऐसा बना ,आज अकेले मैं हम रो दिए ।।
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